सम्पूर्णा के 40 दिवसीय बाल एवं महिला संस्कार शिविर का भव्य समापन — जल संरक्षण एवं जल निकायों के पुनर्जीवन पर विशेष विमर्श
सम्पूर्णा के 40 दिवसीय बाल एवं महिला संस्कार शिविर का भव्य समापन — जल संरक्षण एवं जल निकायों के पुनर्जीवन पर विशेष विमर्श
आज सम्पूर्णा द्वारा दिल्ली के वसंत विहार स्थित जैव विविधता उद्यान में आयोजित बाल एवं महिला संस्कार शिविर के 40वें दिवस के समापन समारोह पर ‘जल संरक्षण एवं जल निकायों के पुनर्जीवन’ विषय पर विशेष चर्चा हुई । इसमे देश के पर्यावरणविदों ने भाग लिया। सम्पूर्णा, जो पिछले 32 वर्षों से महिला एवं बाल सशक्तिकरण तथा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय है, इस शिविर का आयोजन प्रतिवर्ष करती है। यह 40 दिवसीय शिविर 19 मई 2025 को प्रारंभ हुआ था और इस वर्ष इसका 25वाँ संस्करण था। शिविर के दौरान बच्चों और महिलाओं को नैतिक शिक्षा, वैदिक श्लोकों का अभ्यास, शिष्टाचार प्रशिक्षण, चित्रकला, कविता लेखन तथा जल संरक्षण पर आधारित संगोष्ठियों और प्रतियोगिताओं के माध्यम से संस्कारों एवं संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाया गया।
समापन समारोह के मुख्य अतिथियों में श्री दीपक पर्वतियार (संरक्षक एवं प्रधान संपादक, ग्लोबल बिहारी, सदस्य, विश्व जल परिषद, फ्रांस), डॉ. राजेन्द्र पोद्दार (पूर्व निदेशक, जल एवं भूमि प्रबंधन संस्थान [WALMI], धारवाड़), प्रो. सी. आर. बाबू (प्रोफेसर एमेरिटस एवं संस्थापक, जैव विविधता पार्क; पूर्व प्रो-वाइस चांसलर, दिल्ली विश्वविद्यालय) और डॉ. बलराम पाणी (प्राचार्य, भास्कराचार्य प्रायोगिक विज्ञान महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय) शामिल थे। सभी अतिथियों ने जल के महत्व और उसके संरक्षण की अनिवार्यता पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए गहन विचार प्रस्तुत किए।
श्री दीपक पर्वतियार ने कहा कि "जल संकट केवल भविष्य का नहीं, वर्तमान का भी प्रश्न है। यदि हम आज नहीं जागे, तो अगली पीढ़ियाँ हमें क्षमा नहीं करेंगी। सम्पूर्णा जैसे संगठनों द्वारा चलाया गया यह जागरूकता अभियान अत्यंत प्रशंसनीय है।"
डॉ. राजेन्द्र पोद्दार ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा, "भारत में सूखे जल स्रोतों को कैसे पुनर्जीवित किया गया, यह दिल्ली में भी उदाहरण बन सकता है। हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ परंपरागत ज्ञान को जोड़ने की आवश्यकता है।"
प्रो. सी. आर. बाबू ने जैव विविधता और जल के आपसी संबंधों को रेखांकित करते हुए कहा, "बड़े-बड़े शहरों में जल निकायों का समाप्त होना न केवल पानी की कमी बल्कि जैविक असंतुलन का भी कारण बन रहा है। यह एक पर्यावरणीय आपातकाल है।"
डॉ. बलराम पाणी ने युवाओं और विद्यार्थियों की भूमिका पर बल देते हुए कहा, "शिक्षा संस्थानों को जल संरक्षण की प्रयोगशालाएँ बनाना होगा, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव है।"
सम्पूर्णा संस्थापिका डॉ. शोभा विजेन्द्र जी ने अपने संकल्प को दोहराते हुए भावुक शब्दों में कहा, “यह केवल एक शिविर नहीं, बल्कि एक चेतना है – जो बच्चों और महिलाओं को न केवल अच्छे संस्कार देती है, बल्कि प्रकृति से जुड़ने की गहरी अनुभूति भी कराती है। आज जब दिल्ली के अनेक जल स्रोत विलुप्ति की कगार पर हैं, सम्पूर्णा ने उन्हें पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया है। हमें बूँद-बूँद बचानी होगी, तभी जीवन बचेगा।”
कार्यक्रम में प्रमुख पर्यावरणविद, महिला प्रतिनिधि, स्वयंसेवक, शिक्षाविद, छात्र व अभिभावक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम में मौजूद सभी वक्ताओं ने संस्थापिका डॉ. शोभा विजेंद्र जी के 5 पॉइंट एनवायरमेंटल फ्रेंडली एजेंडा से सहमति जताई। सम्पूर्णा और वक्ताओं द्वारा दिल्ली के ऐतिहासिक स्थलों, स्कूलों, कॉलेजों, सरकारी कार्यालयों और उद्यानों में जल निकायों के निर्माण, लुप्त जल स्रोतों के पुनर्जीवन की आवश्यकता पर बल दिया। साथ-ही-साथ जल एवं प्रकृति संरक्षण को स्कूल-कॉलेजों के पाठ्यक्रम में शामिल करने पर बल दिया। जल एवं प्रकृति संरक्षण के लिए यूनिवर्सिटी का निर्माण कराया जाना चाहिए तथा सॉलिड वैस्ट को नदी नालों में न बहाने का विचार प्रस्तुत किया गया।
समारोह में सम्पूर्णा की टीम एवं कार्यकर्ताओं द्वारा जल संरक्षण एवं प्रकृति पर विशेष नाटक का भी आयोजन किया गया । पूरे वातावरण में एक प्रेरणादायक ऊर्जा थी – जैसे सब मिलकर प्रकृति को पुनर्जीवित करने का संकल्प ले रहे हों। कार्यक्रम का उद्देश्य दिल्लीवासियों को जल निकायों के संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन की दिशा में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करना था। समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ, जिसमें सभी प्रतिभागियों ने खड़े होकर सामूहिक रूप से अपनी श्रद्धा और प्रतिबद्धता व्यक्त की।
